Suppression and Failure of the 1857 Revolution

Suppression and Failure of the 1857 Revolution – There are many reasons for the suppression and failure of the 1857 revolution, which we will study in detail. पिछले भाग में हमने 1857 की क्रांति का कारण, आन्दोलन, प्रमुख व्यक्ति एवं अन्य जानकारी प्राप्त की । 
आज हम इस क्रांति के दमन एवं असफलता का क्या कारण था इसके बारे में जानेंगे ।

1857 की क्रांति का दमन एवं असफलता-Suppression and Failure of the 1857 Revolution

Suppression and Failure of the 1857 Revolution

विद्रोह का दमन – Suppression of Rebellion

  • विद्रोह का केंद्र मुख्यतः उत्तर भारत था , पंजाब, राजपुताना दक्षिण व बंबई प्रेसिडेंसी अप्रभावित था । 
  • सितम्बर 1857 में अंग्रेजों ने दिल्ली पर पुनः कब्ज़ा कर लिया । 
  • 1858 ई. तक विद्रोहों को कुचल दिया गया था । 
  • बहादुर शाह द्वितीय को कैदी बनाकर रंगून भेज दिया गया जहाँ उनकी मृत्यु हो गयी थी । 
  • सितम्बर 1857 ई. में अंग्रेजो ने लखनऊ पर कब्ज़ा कर लिया था किन्तु बेगम हजरत महल ने आत्मसमर्पण से इंकार कर दिया था । 
  • रानी लक्ष्मी बाई झाँसी से निकलकर तात्या टोपे के सहयोग से ग्वालियर पर कब्ज़ा करने का प्रयास किया । 
  • किन्तु अंततः जून 1858 को ह्यूरोज से लडती हुई उनकी मृत्यु हो गई । 
  • नाना साहब नेपाल चले गए और कुंवर सिंह की घायल अवस्था में उनकी मृत्यु हो गई । 
  • तात्या टोपे को उनके मित्र मानसिंह ने पकडवा दिया बाद में उन्हें फांसी दे दी गई । 
  • विद्रोहों को कुचलने में बर्नाड निकोल्सन, हडसन, कैम्पवेल एवं नील आदि को भारतीय राजा, निजाम तथा सामंतों ने सहयोग किया । 
  • ग्वालियर के सिंधिया , इंदोर के होल्कर, हैदराबाद के निजाम, भोपाल के नवाब, राजपूत शासक एवं पटियाल पंजाब व नेपाल के शासकों ने विद्रोहों को कुचलने में अंग्रेजों की सहायता की । 
  • कैनिंग का कथन था की \” इन शासकों व सरदारों ने तूफान के आगे बाँध का काम किया वर्ना ये तूफ़ान एक ही लहर में हमें बहा ले जाता \”। 

1857 की क्रान्ति के असफलता का कारण – The Reason for the Failure of the Revolution of 1857

 1. सुनियोजित कार्यक्रम व संगठन का आभाव 

  • 1857 की क्रांति बिना किसी पूर्व नियोजित योजना के ही प्रारंभ हो गया था । 
  • यद्यपि विद्रोह के लिए 31 मई 1857 की तारीख को निश्चित किया गया था किन्तु यह विद्रोह समय से पहले ही प्रारम्भ हो गया ।
  • इसके अतिरिक्त विद्रोही एकजुट होकर कोई मजबूत संगठन भी नहीं बना पाए थे ।

2. सर्वमान्य उद्देश्य का आभाव 

  • 1857 की क्रांति के क्रांतिकारियों का कोई लक्ष्य भी सुनिश्चित भी नहीं था ।
  • क्रांति में शामिल होने के सबके अपने अलग अलग करण थे ।
  • झाँसी की रानी अपने झाँसी के लिए लड़ रही थी और मुग़ल सम्राट अपनी सत्ता के लिए लड़ रहे थे ।
  • नाना साहब अपने पेंशन के लिए लड़ रहे थे ।
  • कुंवर सिंह अपनी जमींदारी से बेदखल होने के कारण लड़ रहे थे ।
  • सैनिक चर्बी वाले कारतूस के कारण लड़ रहे थे ।

3. केन्द्रीयकृत व योग्य नेतृत्त्व  का आभाव 

  • नेता एकजुट व संगठित होकर क्रांति का नेतृत्त्व नहीं कर सके ।
  • यद्यपि उनमें साहस व वीरता थी किन्तु अंग्रेजी कूटनीति एवं सैन्य संचालन के सामने टिक नहीं पाए ।

4. विद्रोह का सीमित स्वरूप होना  

  • ये क्रांति उत्तर भारत एवं मध्य भारत के कुछ भाग तक ही सीमित थी ।
  • बंगाल, पंजाब , कश्मीर, उड़ीसा, दक्षिण भारत तक इस क्रांति की आंच नहीं पहुँच पाई थी ।
  • इस प्रकार ये विद्रोह अखिल भारतीय स्वरूप नहीं ले पाया था ।
  • यदि यह विद्रोह पुरे भारत में विस्तृत होता तो इसका दमन इतना आसन नहीं होता ।

5. जनसमर्थन का आभाव  

  • क्रांति की असफलता का एक कारण जन सहयोग का आभाव था ।
  • भारतीय समाज का उच्च व मध्यम शिक्षित वर्ग, धनि, व्यापारी लोग इस विद्रोह से स्वयं को अलग रखे थे ।

6. विद्रोहियों का सीमित साधन   

  • कम्पनी की तुलना में विद्रोहियों के पास अत्यंत सीमित साधन थे ।
  • उनके पास जन धन व वस्त्रों का आभाव था ।
  • अंग्रेजो ने विद्रोहियों के दमन के लिए यातायात व संचार का लाभ उठाकर सेना को एक जगह से दुसरे जगह जल्द ही भेज देते थे ।

7. देशी नरेश व सामंतों की भूमिका 

  • 1857 की क्रांति में अनेक महत्वपूर्ण व शक्तिशाली नरेशों ने अंग्रेजो का साथ दिया ।
  • सिंधिया व होल्कर अंग्रेजों के वफादार बने ।

Raja Ram Mohan Roy Establishment of Brahma Samaj

Raja Ram Mohan Roy Establishment of Brahma Samaj –  Raja Rammohan Roy is said to be the forerunner of the Indian renaissance.
It is also said that he is the father of the Renaissance, the creator of modern India, the father of the religious reform movement, the bridge of the past and the future, the pioneer of Indian journalism, the prophet of Indian nationalism and the first modern man of India.

Raja Ram Mohan Roy and Brahma Samaj     राजा राम मोहन राय ब्रह्म समाज की स्थापना

Raja Ram Mohan Roy Establishment of Brahma Samaj
राजा राममोहन राय को भारतीय पुनर्जागरण का अग्रदूत कहा जाता है। यह भी कहा जाता है कि वे पुनर्जागरण के जनक, आधुनिक भारत के निर्माता, धार्मिक सुधार आंदोलन के पिता, अतीत और भविष्य के पुल, भारतीय पत्रकारिता के अग्रणी, भारतीय राष्ट्रवाद के प्रवर्तक और  भारत का प्रथम आधुनिक पुरुष थे ।
जन्म – 1772
स्थान – राधानगर बंगाल 
भाषा के ज्ञाता – संस्कृत, अरबी , फ़ारसी, अंग्रेजी, फ्रेंच, लैटिन एवं ग्रीक आदि ।
मृत्यु – 1833 ( ब्रिस्टल इंग्लैण्ड )

राजा राममोहन रॉय से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्य 

  • उन्होंने अपने विचारों को आगे बढाने के लिए 1814 में आत्मीय सभा की स्थापना की, जो आगे चलकर 1828 में  \”ब्रह्मसमाज\”  बना ।
  • राजा राममोहन रॉय की भारतीय समाज व संस्कृति में गहरी आस्था थी ।
  • उनका मानना था की भारतीय नवजागरण के लिए पाश्चात्य संस्कृति अच्छे तत्वों को स्वीकार करना चाहिए ।
  • किन्तु उन्होंने पाश्चात्य संस्कृति के अंध अनुकरण के स्थान पर आधुनिकीकरण पर जोर दिया ।
  • 1817 में डेविड हेयर के साथ कलकत्ता में हिन्दू कॉलेज की स्थापना की ।
  • 1821 में संवाद कौमुदी पत्रिका का सम्पादन किया ।
  • 1822 में फ़ारसी भाषा में \”मिरातुल अखबार \” का प्रकाशन किया ।
  • 1823 में कलकत्ता यूनेटेरियन कमिटी की स्थापना की, जिसमें द्वारकानाथ टैगोर तथा विलियम एडम उनके सहयोगी थे ।
  • 1825 में वेदांत कॉलेज की स्थापना ।
  • 1828 में ब्रह्मसमाज की स्थापना ( इसके प्रथम सचिव ताराचंद चक्रवर्ती थे ) ।
  • 1829 में सती प्रथा कानून पारित कराया गया ।
  • 1830 में ब्रिटेन प्रस्थान 
  • 1833 में इंग्लॅण्ड के ब्रिस्टल में मृत्यु ।

ब्रह्मसमाज 

1828 में राजा राममोहन रॉय द्वारा कलकत्ता में ब्रह्मसभा की स्थापना की गई, जिसे बाद में \”ब्रह्मसमाज\” कहा गया।

स्थापना का उद्देश्य  

  • इस संस्था के स्थापना का प्रमुख उद्देश्य भारतीय समाज व हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों को दूर कर उन्हें शुद्ध करना था ।
  • इस संस्था ने सामाजिक, धार्मिक राजनितिक व शैक्षणिक क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया ।

धार्मिक विचार  

  • मूर्ति पूजा का विरोध ।
  • बहुदेव वाद का विरोध ।
  • अवतारवाद का विरोध ।
  • पुरोहितवाद का विरोध ।
  • पुनर्जन्म के सिधांत का विरोध ।
  • पुराणों की आलोचना ।
  • वेदान्तों के अध्ययन पर जोर ( उपनिषेद )।
  • एकेश्वरवाद का समर्थन ।
इन्होने फ़ारसी भाषा में \” तुहाफत-उल-मुकहदिन\” या एकेश्वरवादीयों को उपहार या Gift to Monotheist की रचना की । इन्होने प्रिसेपटस ऑफ़ जीसस की भी रचना की ।

सामाजिक विचार  

  • राजा राममोहन रॉय की महत्वपूर्ण भूमिका से 1829 में सती प्रथा का अंत हुआ ।
  • उन्होंने पर्दाप्रथा, बहुविवाह, सती प्रथा, वैश्यावृत्ति, जातिवाद, बालविवाह आदि का विरोध किया ।
  • उन्होंने कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था का समर्थन किया ।
  • वे स्त्री पुरुष समानता के समर्थक थे ।
  • स्त्रियों को शिक्षा दिलाने तथा सम्पति का अधिकार दिलाने का प्रयास भी किया ।

राजनितिक विचार  

  • वे अन्तर्राष्ट्रीयवादिता के समर्थक थे  । 
  • उन्होंने भारतीय वस्तुओं पर लगान में कमी ।
  • निर्यात शुल्क में कमी ।
  • उच्च सेवाओं में भारतीकरण की मांग की ।

शिक्षा, साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में  

  • वे अंग्रेजी माध्यम से आधुनिक शिक्षा के समर्थक थे ।
  • 1817 में डेविड हेयर के साथ मिलकर उन्होंने कलकत्ता में हिन्दू कॉलेज की स्थापना की ।
  • 1825 में वेदांत कॉलेज की स्थापना ।
  • राजा राममोहन रॉय को भारतीय पत्रकारिता का अग्रदूत भी कहा जाता है ।

ब्रह्मसमाज का प्रभाव 

ब्रह्मसमाज की बौद्धिकता जिसमें भावनाओं का आभाव था, केवल उच्च वर्ग के शिक्षितों को ही आकर्षित कर सका, मध्यम वर्गीय लोगो पर इसका विशेष प्रभाव नहीं पड़ा था ।

राजा राममोहन रॉय के बाद  ब्रह्मसमाज 

  • राजा राम मोहन की मृत्यु के बाद देवेन्द्र नाथ टैगोर ने ब्रह्मसमाज को नेतृत्त्व प्रदान किया ।
  • ब्रह्मसमाज में सम्मिलित होने से पहले देवेन्द्र नाथ टैगोर कलकत्ता में तत्वरंजनी सभा की स्थापना की थी, जो 1839 में तत्वबोधिनी सभा में परिवर्तित हुआ ।
  • उन्होंने तत्वबोधिनी पत्रिका का भी प्रकाशन किया ।

ब्रह्मसमाज का विभाजन 

  • ब्रह्मसमाज के विचारों को लेकर 1865 में देवेन्द्र नाथ टैगोर व केशवचंद्र सेन के मध्य विवाद उत्पन्न हुआ, तथा ब्रह्मसमाज दो भागों में बंट गया ।
  • देवेन्द्र नाथ टैगोर का परिवर्तन विरोधी दल \”आदिब्रह्मसमाज\” कहलाया ।
  • केशवचंद्र सेन ने \”मूलब्रह्मसमाज\” से अलग होकर \” भारतीय ब्रह्मसमाज\” या ब्रह्मसमाज ऑफ़ इंडिया की स्थापना की थी ।

केशवचंद्र सेन 

  • केशवचंद्र सेन का ब्रह्मसमाज में प्रवेश 1856 में हुआ ।
  • केशवचंद्र सेन ने \”बालबोधिनी पत्रिका\” निकाली ।
  • उन्होंने नव विधान की स्थापना की ।
  • 1861 में इन्होने Indian Marriage नामक पत्रिका निकाली ।
  • इन्हीं के प्रयास से 1872 में Native Marriage Act पारित हुआ, जिसमें 14 वर्ष से कम आयु की बालिका व 18 वर्ष से कम आयु के बालको का विवाह वर्जित कर दिया गया ।
  • केशवचंद्र सेन ने 13 वर्षीय पुत्री का विवाह कुच बिहार ( पश्चिम बंगाल ) के राजा से कर दिया, को की ब्रह्म समाज में द्वितीय विघटन का कारण बना ।

ब्रह्मसमाज का द्वितीय विघटन  

  • 1878 में ब्रह्मसमाज में पुनः फुट पड गई, केशवचंद्र सेन मतभेद रखने वालों ने साधारण ब्रह्मसमाज की स्थापना की ।
  • मुख्य रूप से आनंद मोहन बोस, शिवनाथ शास्त्री द्वारका नाथ गांगुली साधारण ब्रह्मसमाज में थे ।

अन्य तथ्य  

  • राजा राममोहन रॉय ने प्रज्ञा चाँद नामक पत्रिका का भी प्रकाशन किया ।
  • मुग़ल बादशाह अकबर II ने राजा राममोहन राय को \”राजा\” की उपाधि प्रदान की थी, तथा अपना दूत बनाकर ब्रिटिश सरकार के पास भेजा था ।
  • केशवचंद्र सेन ने 1870 में Indian Reform की स्थापना की ।

Result, Form and Importance of Revolution of 1857

Result, Form and Importance of Revolution of 1857 – यद्यपि 1857 की क्रांति असफल हो गई थी किन्तु इस विद्रोह ने अंग्रेजी निति व प्रशासन में आमूलचूल ( बड़ा परिवर्तन ) परिवर्तन करने के लिए अंग्रेजों को बाध्य होना पड़ा ।

Revolution of 1857 Result, Form and Importance  1857 की क्रांति का परिणाम, स्वरूप और महत्व

Result, Form and Importance of Revolution of 1857

क्रांति का परिणाम

इस परिवर्तन का परिणाम निम्न प्रकार से है : 

1. महारानी का घोषणा पत्र 

1 नवम्बर 1858 को इलाहाबाद में महारानी का घोषणा पढ़ा गया, जिसमें भारत सरकार की नवींन निति का उल्लेख किया गया था, जिसके अंतर्गत या तहत निम्न परिवर्तन किये गए —
  • हड़पनिति त्याग दी जायेगी और नरेशों को दत्तक पुत्र लेने का अधिकार होगा ।
  • भविष्य में भारतियों रियासतों का अकारण विलय नहीं किया जायेगा ।
  • भारतीय सामाजिक एवं धार्मिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा ।
  • धर्म, जाति, लिंग एवं क्षेत्र भेद के बिना नौकरियों का द्वार सभी के लिए खोला जाएगा ।
  • सेना का पुनर्गठन किया जाएगा तथा सेना में भारतियों तथा यूरोपियों का अनुपात 2:1 किया जाएगा । किन्तु महत्वपूर्ण पदों पर अंग्रेजों की ही नियुक्ति की जायेगी ।
  • भारत परिषद अधिनियम 1861 के द्वारा विधायका का गठन कर भारतीयों को शामिल किया जाएगा ।
इन सब घोषणा के साथ हिन्दू और मुस्लिम को बांटने और फुट दालों शासन करो की निति अपनाई गयी जिससे भारत में सांप्रदायिकता की स्थिति उत्पन्न हुई ।

2. कम्पनी शासन का अंत 

  • ब्रिटिश संसद ने 1858 के अधिनियम के द्वारा कम्पनी के शासन का अंत कर दिया गया और भारत का प्रशासन ब्रिटिश सरकार ने महारानी के नाम पर अपने हाथों में ले लिया ।
  • 1858 के अधिनियम के तहत भारत सचिव की नियुक्ति की गई तथा उसके सहयोग के लिए 15 सदस्य भारत परिषद की स्थापना की गई ।
  • इस अधिनियम के तहत गवर्नर जनरल को वायसराय का दर्जा दिया गया, और उसे सीधे सम्राट के प्रति उत्तरदायी बनाया गया ।
  • कैनिंग प्रथम वायसराय बने ।

क्रांति का स्वरूप 

1857 के विद्रोह के स्वरुप को लेकर विद्वानों के बिच बहुत मतभेद या भिन्नता देखने को मिलता है , विभिन्न विद्वानों के मत निम्नानुसार है : 
  • यह एक सैनिक विद्रोह मात्र था इसके अलावा और कुछ भी नहीं — सिले , पर्सिवाल स्पीयर ।
  • यह धर्मान्धों ईसाईयों के विरुद्ध विद्रोह था — एल. राज. रीज ।
  • ये सभ्यता एवं बर्बरता के बीच एक युद्ध था — टी. आर. होन्स ।
  • ये अंग्रेजो के विरुद्ध हिन्दू मुस्लिम का षड्यंत्र था — आऊट्राम, टेलर, हंटर ।
  • ये राष्ट्रीय आन्दोलन था — बेंजामिन डिजरोयली ।
  • यह एक महान राष्ट्रीय विद्रोह था — अशोक मेहता ( पुस्तक – ग्रेट रिबेलियन )।
  • प्रथम स्वतंत्रता संग्राम — वीर सावरकर ।
  • पुरातन व्यवस्था का अपनी पुनर्स्थापना के लिए अंतिम प्रयास था — ताराचंद ।
  • यह एक जनक्रांति थी — रामविलास शर्मा 
  • तथाकथित राष्ट्रीय संग्राम न तो प्रथम था ना ही राष्ट्रीय था और ना ही स्वतंत्रता संग्राम था — आर.सी. मजुमदार ।
  • 1857 का विद्रोह केवल सैनिक विद्रोह था जिसका तात्कालिक कारण केवल चर्बी वाला कारतूस था — पी. रोबर्टसन
  • ये न तो केवल सैनिक विद्रोह था न तो स्वतंत्रता संग्राम, यह सैनिक विद्रोह से कुछ अधिक और राष्ट्रिय स्वतंत्रता संग्राम से कुछ कम था — वाल्कत स्टेंस ।

क्रांति का महत्व 

  • 1857 के विद्रोह की असफलता ने भारतियों को इस तथ्य से परिचित कराया की विद्रोहों में मात्र सैन्य बल के प्रयोग से सफलता नहीं पाई जा सकती । बल्कि समाज के सभी वर्गों का सहयोग व समर्थन और राष्ट्रीय भावना भी आवश्यक है ।
  • इस विद्रोह ने भारतीयों में विदेशी सत्ता के विरुद्ध एकता व राष्ट्रीयता की भावना का बीज बोया ।
  • विद्रोह के बाद भारत सरकार के ढांचे व नीतियों में महत्वपूर्ण परिवर्तन किये गए ।
  • संवैधानिक सुधारों का सूत्रपात हुआ, तथा भारतियों को धीरे धीरे अपने देश के शासन में भाग लेने का अवसर मिला ।

अन्य महत्वपूर्ण तथ्य  

  • ग़ालिब ने 1857 की क्रांति/विद्रोह को देखा था 
  • एचिसन ने 1857 की क्रांति के सम्बद्ध में कहा \” इस मिसाल में हम हिन्दू मुस्लिम को भिड़ा नहीं पाए \” 
  • जॉन लोरेन्स ने कहा \” यदि विद्रोहियों में एक भी योग्य नेता होता तो हम सदा के लिए विद्रोह हार जाते \” 
  • नाना साहब के सेनापति तात्या टोपे थे 
  • अजीम उल्लाह्खान नाना साहब के सलाहकार थे 

कुछ प्रमुख पुस्तकें   

पुस्तकें                                                        नाम 

द फर्स्ट इंडियन वॉर ऑफ़ इन्डेपेंड़ेंस            –     बी. डी. सावरकर 
द ग्रेट रिबेलियन                                               अशोक मेहता 
द सिपॉय म्युटिनी एंड रिवोल्ट ऑफ़ 1857     –     आर. सी. मजुमदार 
द कॉजेस ऑफ़ इंडियन रिवोट                          सर सैय्यद अहमद खां

  • भारत सरकार ने सरकारी इतिहासकार के रूप में सुरेन्द्र नाथ सेन को विद्रोहों का इतिहास लिखने के लिए नियुक्त किया था 
  • फैजाबाद के मौलवी अहमद उल्ला ने अंग्रेजों के विरुद्ध फ़तवा जारी किया व जिहाद का नारा दिया 
  • राजस्थान कोटा में ब्रिटिश विरोधियों का प्रमुख केंद्र था जहाँ जनदयाल व हरदयाल ने विद्रोह का नेतृत्त्व किया 
  • बिहार के कुंवर सिंह के मृत्यु के बाद उनके भाई अमरसिंह ने विद्रोह को नेतृत्त्व प्रदान किया 
  • उड़ीसा में संबलपुर के राजपुर सुरेन्द्र साय विद्रोह के नेता बने 

Jhansi ki Rani, Tatya Tope, NanaSahab, Bahadur Sah Jafar-1857 Revolution

Jhansi ki Rani, Tatya Tope, NanaSahab, Bahadur Sah Jafar-1857 Revolution: इसके पहले हमने 1857 की क्रांति Part 1 में पढ़ा की  कैसे शुरू हुई और क्या कारण थे । आज हम पढेंगे की 1857 क्रांति के प्रमुख व्यक्ति, उसका नेतृत्व और विद्रोह का दमन कर्ता  ।

Jhansi ki Rani, Tatya Tope, NanaSahab, Bahadur Sah Jafar-1857 Revolution

Jhansi ki Rani, Tatya Tope, NanaSahab, Bahadur Sah Jafar-1857 Revolution


1857 की क्रांति के समय 

  • निर्धारित तारीख               – 31 May 1857
  • प्रतीक                           – कमल फूल एवं चपाती 
  • भारत का गवर्नर जनरल    – लार्ड केनिंग 
  • मुगल सम्राट                    – बहादुर शाह जफर II 
  • ब्रिटेन प्रधानमन्त्री             – लार्ड पाम्सर्तन
  • ब्रिटेन महारानी           – महारानी विक्टोरिया 
  • कमांडिंग अधिकारी         – हैस्से
  • सैन्य छावनी के अधिकारी – जनरल डेविड 

1857 क्रांति से जुड़े महत्वपूर्ण व्यक्ति 

1. बहादुर शाह जफर II : Bahadur Sah Jafar

  • 1857 की क्रांति इसी मुगल बादशाह के शासन काल में हुआ था ।
  • बहादुर शाह को विद्रोहियों ने अपना नेता घोषित किया उस समय उनकी उम्र 82 वर्ष की थी 
  • जब 1857 का विद्रोह का दमन होने लगा तब अंग्रेज सैन्य जनरल हड्सन ने इन्हें दिल्ली स्थित हुमायूँ के मकबरें में कैद किया 
  • 1858 में बहादुर शाह (Bahadur Shah) को निर्वासित कर रंगून भेजा गया और 1862 में उनकी मृत्यु हो गई , इनकी समाधी रंगून में ही है । 
  • शायर होने की वजह से ही उन्हें जफ़र (Jafar) कहा जाने लगा 

2. रानी लक्ष्मी बाई (Jhansi ki Rani ) : इनका मुल नाम मणिकर्णिका / मनु 

  • 13 वर्ष की आयु में झांसी के नरेश \”गंगाधर राव\” के साथ इनका विवाह हुआ 
  • 1852 में गंगाधर राव की निसंतान मृत्यु होने पर दत्तक पुत्र \”दामोदर राव \”  को अंग्रेजों ने झांशी का वास्तविक उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया ।
  • 1857 के विद्रोह के दौरान रानी लक्ष्मी बाई ने झांसी से विद्रोह का नेतृत्व किया , इस कार्य में उनका साथ \”तात्या टोपे\” ने दिया ।
  • 17 June 1858 को झांसी के रानी (Jhansi ki Rani) वीरगति को प्राप्त हुई ।
  • उन्हें पराजित करने वाले जनरल ह्यूरोज ने कहा था की \”विद्रोहियों में वह ही एक मात्र मर्द थी\”।

3. तात्या टोपे  ( Tatya Tope ): इनका मुल नाम रामचंद्र पांडुरंग 

  • 1857 के विद्रोहों में विद्रोहियों की तरफ से लड़ने वाला प्रसिद्ध मराठा नायक था 
  • तात्या टोपे (Tatya Tope )अपनी छापामार युद्ध के लिए प्रसिद्ध थे ।
  • इन्होने कानपुर में अंग्रेजों को चुनौती दी बाद में रानी लक्ष्मी बाई ( Jhansi Ki Rani ) से मिलकर मध्य भारत में अंग्रेजो को चुनौती दी ।
  • सिंधियां के सामंत जो इनके मित्र थे \”मानसिंह\” के विश्वासघात के कारण अंग्रेजों ने उन्हें पकड लिया और फांसी की सजा दी।

4. कुंवर सिंह   ( Kunwar Singh )

  • बिहार के आरा जिले के प्रमुख जमींदार जिनके गाँव का नाम जगदीश पुर था 
  • अंग्रेजों ने इनकी जमींदारी छीन लि थी अतः इन्होने विद्रोह किया ।
  • विद्रोह के समय लगभग इनकी आयु 80 वर्ष थी , यह एक मात्र ऐसे नेता थे जिन्होंने अंग्रेजो को कई बार पराजित किया था ।

5. बेगम हजरत महल ( Begam Hajrat Mahal )

  • अवध के अंतिम नवाब \”वाजिद अलीशाह\” पत्नी थी , अंग्रेजों ने नवाब को अपदस्थ कर कुशासन के आधार पर अवध को मिला लीया था और तभी \”बेगम हजरत महल\” ने विद्रोह किया ।
  • इन्होने अपने अवयस्क पुत्र \” विजरिस कादिर\” को नवाब नियुक किया परन्तु अंग्रेजों ने उनके विद्रोह का दमन किया ।
  • अंततः उन्हें अवध छोडकर नेपाल जाना पड़ा जहाँ उनकी मृत्यु हो गई ।

6. जनरल बख्त खां (General Bakht Khaan)

  • विद्रोहियों ने बहादुर शाह II को अपना नेता घोषित किया किन्तु शाह प्रतीकात्मक नेता थे  ।
  • वास्तविक नेतृत्व जनरल बख्त खां ने दिल्ली से किया  ।

7. नाना साहब  ( Nana Sahab ) मूल नाम – धोंधू पन्त 

  • ये अंतिम पेशवा \”बाजीराव II\” के दत्तक पुत्र थे ।
  • यह अपने निर्वाषित पिता \”बाजीराव II\” के साथ कानपुर जिले के \”बिठुर\” में निवास करते थे ।
  • इनकी पिता के मृत्यु के पश्चात् लार्ड डलहौजी ने इनकी पैतृक वार्षिक  पेंशन बंद कर दिया था इसलिए इन्होने कानपुर से इनका विद्रोह किया। 
विद्रोह के नेतृत्व कर्ता एवं दमन कर्ता 

       स्थान नेतृत्वकर्ता   दमनकर्ता 
  1. दिल्ली बहादुर शाह जफर II एवं  बख्त खां    बर्नार्ड निकोल्सन एवं हड्सन 
  2. कानपुर (UP ) नाना साहब एवं तात्या टोपे  कैम्पवेल
  3. जगदीशपुर(आरा UP) कुंवर सिंह विंसेट आयर एवं विलियम टेलर 
  4. झांसी  रानी लक्ष्मी बाई (Jhansi Ki Rani)ह्यूरोज 
  5. मध्यभारत ग्वालियर  तात्या टोपे (Tatya Tope) ह्यूरोज 
  6. लखनऊ (अवध ) बेगम हजरत महल व विजरिस कादिर  कैम्पवेल 
  7. फैजबाद      मौलवी अहमद उल्ला           कैम्पवेल 
  8. इलाहाबाद     लियाकत अली                  कर्नल नील 
  9. बरेली     खान बहादुर खान                  कैम्पवेल, हैव्लौक एवं आऊट्रम
  10. मथुरा     देवी सिंह 
  11. मेरठ     कदम सिंह 
  12. फतेहपुर    अजीम उल्ला 
  13. गोरखपुर    गजोधर सिंह 
  14. असम   मनीराम दत्त 
 इसके अगले भाग में हम पढेंगे दमन और क्रांति के असफल होने का कारण