Kshetrak Ke Aadhar Par Arthvyavastha

Kshetrak Ke Aadhar Par Arthvyavastha  - हमने अर्थव्यवस्था के प्रकारों के बारे में जाना जिसमें अलग आधारों पर इसे विभाजित किया गया है जिसमें से हम निम्नलिखित आधारों के बारे में जान चुके है -

आज हम \”क्षेत्रक के आधार \” पर प्राथमिक , द्वितीयक एवं तृतीयक अर्थव्यवस्था के विषय में पढेंगे ।

Kshetrak Ke Aadhar Par Arthvyavastha

Kshetrak Ke Aadhar Par Arthvyavastha
अर्थव्यवस्था का क्षेत्रक आर्थिक गतिविधियों से निर्धारित करते है - इसके तीन प्रकार है - 1. प्राथमिक अर्थव्यवस्था 2. द्वितीयक अर्थव्यवस्था 3. तृतीयक अर्थव्यवस्था ।

प्राथमिक अर्थव्यवस्था (Kshetrak Ke Aadhar Par Arthvyavastha)

इस अर्थव्यवस्था में प्रकृति आधारित उत्पादन को लेते है इसलिए यहाँ - कृषि, पशु-पालन, मतस्यन, वानिकी, खनन इत्यादि अभी आर्थिक गतिविधियाँ आती है 

पशु-पालन, मतस्यन व वानिकी को कृषि संलग्न कहते है, छत्तीसगढ़ में खनन द्वितीयक अर्थव्यवस्था में आता है । इसलिए प्राथमिक क्षेत्र को कृषि भी कहते है 

महत्व

इस पर आधारित अर्थव्यवस्था पिछड़ी होती है, क्योंकि ये कच्चे माल ( Raw Material ) को बेचते है उससे तैयार माल नहीं बनाते अर्थात मूल्य संवर्धन ( Value Addition ) नहीं कर पाते । 

बेल्जियम - हिरा कटिंग , स्वीटजरलैंड-बैंकिंग
 

द्वितीयक अर्थव्यवस्था (Kshetrak Ke Aadhar Par Arthvyavastha)

इस अर्थव्यवस्था में प्राथमिक अर्थव्यवस्था से प्राप्त कच्चे माल को तैयार माल में बदलते है। इसलिए इस क्षेत्र को उद्योग क्षेत्र भी कहते है 
यहाँ उद्योग के 2 रूप है --
निर्माण (Construction) -  निर्माण स्थायी वस्तु बनाए को कहते है, जिसमें इमारतें, पुल, सड़क, मशीने सब निर्माण में आती है 
विनिर्माण (Manufacturing) - विनिर्माण में अस्थायी वस्तुएं जिसका उपभोग हो जायेगा । पेन, पेन्सिल इत्यादि 

महत्व

इस पर आधारित अर्थव्यवस्था वस्तु की प्रकृति निर्भर करती है इसलिए ये विकसित अर्थव्यवस्था है , ये दूसरों से कच्चा माल लेकर तैयार माल बनाते है । जापान - कार 
 

तृतीयक अर्थव्यवस्था (Kshetrak Ke Aadhar Par Arthvyavastha)

ये अर्थव्यवस्था प्राथमिक अर्थव्यवस्था एवं द्वितीयक अर्थव्यस्था को कार्य करने में सहायता प्रदान करता है, इसलिए इस क्षेत्र को सेवा क्षेत्र कहते है 
आर्थिक गतिविधियों के लिए बैंकिंग, बीमा, संचार, विपणन, कानून एवं व्यवस्था, परिवहन,कंप्यूटर प्रशासन की आवश्यकता होती है 

महत्व

यह अर्थव्यवस्था भी पूर्णतः विकसित है । इसमें कच्चा माल आधार नहीं अपितु सेवा ( Service ) पर आधारित होती है अर्थात ज्ञान और कौशल से आय अर्जन करती है ।

Economic Activity, Units and Economic Ownership

Economic Activity Units and Economic Ownership – आर्थिक गतिविधि इकाइयाँ और आर्थिक स्वामित्व – इसके पहले हमने पढ़ा की \” क्षेत्रक के आधार पर \” अर्थव्यवस्था जिसमें हमने आर्थिक गतिविधि – प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक अर्थव्यवस्था के बारे में जाना।
आज हम \” क्षेत्रक के आधार पर  \” में   आर्थिक ईकाइयां, आर्थिक स्वामित्व ( सार्वजनिक क्षेत्र , निजी क्षेत्र ) तथा कम्पनी ( प्राइवेट लिमिटेड तथा पब्लिक लिमिटेड ) के बारे में पढेंगे ।

Economic Activity Units and Economic Ownership

आर्थिक गतिविधियाँ -Economic Activity

1. प्राथमिक अर्थव्यवस्था 2. द्वितीयक अर्थव्यवस्था 3. तृतीयक अर्थव्यवस्था – पिछले अध्याय में हमने पढ़ लिया है , समझने के लिए पिछला अध्याय देखे ।

आर्थिक ईकाइयाँ -Economic Units

1. संगठित क्षेत्र Organized Sector

संगठित क्षेत्र की ईकाइयां में  वह ईकाई होती है जहाँ सभी आर्थिक ईकाईयों का पंजीकरण ( Registration ) सरकारी संस्था में  किया जा चूका हो ।

2. असंगठित क्षेत्र Unorganized Sector

असंगठित क्षेत्र की ईकाइयां में  वह ईकाई होती है जहाँ किसी आर्थिक ईकाईयों का पंजीकरण ( Registration ) सरकारी संस्था में  नहीं हुआ हो ।
भारत में 80% असंगठित क्षेत्र है, कृषि इसी के अंतर्गत आता है ।

आर्थिक स्वामित्व -Economic Ownership

आर्थिक कार्य को करने या आर्थिक गतिविधि हेतु निवेश ( Investment ) किसने किया है । इसे 2 भागों में विभाजित किया गया है ।

Economic Activity Units and Economic Ownership

1. सार्वजनिक क्षेत्र – Public Sector

सार्वजनिक क्षेत्र वह क्षेत्र कहलाते है जहाँ सरकार ( Government ) द्वारा 50%-100% निवेश किया जाता है । सरकारी उपक्रम, सरकारी निगम तथा सरकारी कम्पनी ये सार्वजनिक क्षेत्र के रूप है ।
सरकारी उपक्रम का अर्थ उससे है जो सरकार के द्वारा कार्य करते है जैसे :- रेलवे , डाक विभाग, संचार आदि विभाग ।

2. निजी क्षेत्र – Private Sector

निजी क्षेत्र वह क्षेत्र होता है जहाँ 20% निवेश निजी होता है ।
  1. जब संसद के कानून द्वारा नियम बनाया जाये तो वह निगम कहलाता है ।
  2. कम्पनी (Company) वो है जो भारतीय कंपनी अधिनियम (Indian Company Act) के तहत अपना पंजीयन कराएगी ।
  3. निगम से कम्पनी की ओर जाने के 3 कारण थे – स्वायत्ता (autonomy), बदलने में आसानी ( Easy to Change), निवेश बचाना ( Save Investment )।
  4. यही कारण है की स्वतंत्रता के बाद बहुत सारे निगम बनाये गए किन्तु 1990 के बाद हम निगम से कम्पनी की ओर गए ।
  5. Air India से लेकर State Bank सब पहले निगम थे पर अब कम्पनी बन गई है ।
  6. इस समय भारत में निजी क्षेत्र में आर्थिक गतिविधि Company के द्वारा की जाति है, इसमें पंजीयन करना अनिवार्य है ।
  7. सरकार अपनी आर्थिक गतिविधियों को सार्वजानिक क्षेत्रों की ईकाईयों द्वारा पूरी करती है, इसके 3 रूप है ।
  • a) सरकारी उपक्रम – जो आर्थिक कार्य करने वाले सरकारी विभाग है – रेलवे, डाकतार – संचार 
  • b) सरकारी या लोक निगम – ये 100% सरकारी अंशधारिता (Share Holder) से बनते है और इन्हें बनाने के लिए कानून पारित करना पड़ता है । 
  • ये केंद्र की संसद कानून पारित करे तो केन्द्रीय निगम और राज्य सरकार पारित करे तो राज्य निगम होते है जैसे :- ITDC ( Indian Tourism Development Corporation ) RTDC, CCI, RTC.
  • c) सरकारी कम्पनी – सरकारी कम्पनियां वो है जहाँ 100% अंश की आवश्यकता नहीं होती अपितु 50%-100% तक सरकारी निवेश कम्पनी बनाने के लिए पंजीकरण होती है ।

कम्पनी Company

1. Public Ltd. 2.Private Ltd.

Public Ltd. एवं Private Ltd. दोनों सार्वजनिक व निजी क्षेत्रों के लिए हो सकता है ।
Public Ltd में अंशधारी ( Share Holder ) 7 से अधिक या असीमित होते है ।
Private Ltd में अंशधारी ( Share Holder ) 2 से 50 सीमित होते है ।
दोनों क्षेत्र की कम्पनी स्वामित्व से जुडी हुई होती है ।
इनका निर्धारण अंशधारियों से होता है और दोनों एक दुसरे में परिवर्तित हो सकती है ।
Private Ltd की कम्पनी को बाजार से अंश (Share) जुटाने होते है ।
यहाँ LTD  शब्द से तात्पर्य सिमित दायित्व  Limited Liability से है ।
यहाँ LTD  शब्द का अर्थ है की कम्पनी के अंशधारियों का दायित्व ( लगाये गए पैसे ) से है, जिसका अर्थ है की अगर कम्पनी डूबती भी है तो अंशधारियों की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी ।

Indian Market,Types and Function of Indian Market

Indian Market and Types and Function of Indian Market – भारतीय अर्थव्यवस्था क्या है तथा इसका निर्धारण कितने आधार पर किया गया है, साड़ी जानकारी हमने पढ़ी है । इस पोस्ट में हम भारतीय बाजार एवं इसके प्रकार के बारे में जानेंगें ।

 Market and Types & Function of Market

Indian Market and Types and Function of Indian Market

बाजार – Market 

बाजार वह काल्पनिक क्षेत्र है जहाँ आर्थिक गतिविधियों का निष्पादन होता है, तथा जिस वजह से बाजार बना है उसका मूल गतिविधि \”विनिमय\” Exchange ( क्रय-विक्रय) है । इसमें एक बेचने के लिए उत्पादन व उत्पादन के लिए निवेश करेगा 


बाजार के कार्य  – Function of Market 

  1. आर्थिक वस्तुओं एवं सेवाओं का विनिमय ।
  2. अन्य आर्थिक गतिविधियाँ उपभोग, उत्पादन, निवेश ।
  3. क्रेता एवं विक्रेता को मिलाने के लिए ।
  4. बाजार बना है – सौदेबाजी से मूल्य का निर्धारण के लिए ।
  5. मांग व पूर्ति का संतुलन करने के लिए ।
  6. बाजार वह स्थान है जहाँ  मांग वक्र ( Demand Curve ) एवं पूर्ति वक्र ( Supply Curve ) एक दुसरे को काटते है और वस्तु एवं सेवा का मूल्य निर्धारण है । इसे ही बाजार मूल्य प्रणाली कहते है ।
Mathematically 3 चीजें होती है :- 

1. मांग वक्र ( Demand Curve )
2. पूर्ति वक्र ( Supply Curve )
3. बाजार वक्र ( Market Curve )

बाजार के प्रकार  – Types of Market 

एकाधिकार बाजार (Monopoly Market) – जहाँ एक ही आपूर्तिकर्ता ( Suplliers ) होता है । यहाँ आपूर्तिकर्ता राजा (King) होता है, और उपभोक्ता (ग्राहक) का शोषण होता है   

उपभोक्ता को अच्छी किस्म का माल सही समय पर प्राप्त नहीं होता है । जैसे भारत में – डाक-तार एवं  रेल्वे इसी का उदाहरण है  

अल्पाधिकार बाजार (Oligopoly Market) – जहाँ कुछ ही आपूर्तिकर्ता ( Suplliers ) होते है 

प्रतिस्पर्धी बाजार (Competitive Market) – जहाँ बहुत से  आपूर्तिकर्ता ( Suplliers ) होते है, और उपभोक्ता (Consumer) राजा होता है, इनके पास बहुत से विकल्प होते है, इसी कारण इसमें गुणवत्ता अच्छी होती है। हर देश  प्रतिस्पर्धी बाजार (Competitive Market) बनाने का प्रयास करता 

  • आपूर्तिकर्ता के बीच आपसी समझौते को \”उत्पादक संघ\” ( Cartels ) कहा जाता है ।आपूर्तिकर्ता शोषक एवं उपभोक्ता का शोषण करते है – जैसे तेल के निर्यातक तेल के लिए, माइक्रोसोफ्ट व इंटेल का गठजोड़ अर्थात एक दुसरे के साथ बिकेगा 
  • दुनियां का हर देश Monopoly एवं Oligopoly को रोककर Competitive Market लाना चाहता है ।
  • अमेरिका में Anti-Trust-Sermon लाया गया और Monopoly को तोडा गया ।
  • भारत में Monopoly को तोड़ने के लिए Competitive Act है ।
  • MRTP – Monopoly Restricted Trade Practice 1969.

National Income Measuring Methods – GDP, NDP, GNP

National Income Measuring Methods – GDP, NDP, GNP – किसी अर्थव्यवस्था में उत्पादन का संग्रह या किसी अर्थव्यवस्था में उत्पादन शक्ति राष्ट्रिय आय कहलाती है । 
दुसरे शब्दों में कहा जाए तो किसी भी अर्थव्यवस्था में वस्तुओं व् सेवाओ का प्रवाह राष्ट्रीय आय है, अर्थव्यवस्था में किसी वित्तीय वर्ष में अंतिम उत्पादित और सेवा का मौद्रिक मूल्य राष्ट्रिय आय है ।
\”अंतिम\” शब्द का प्रयोग इसलिए किया जाता है ताकि दोहरी गणना ना हो ।

National Income Measuring Methods 

GDP, NDP, GNP

राष्ट्रिय आय की गणना की विधियाँ 

1. आय विधि 
2. व्यय विधि 
3. उत्पादन विधि 

1. आय विधि – Income Method

किसी अर्थव्यवस्था में उत्पादन के कारकों को प्राप्त होने वाले आय का कुल योग राष्ट्रिय आय है । लेकिन ये विधि भारत में वहीँ प्रयोग में आती है जहाँ आय निर्धारित और घोषित है ।
Salary Sector – वेतन क्षेत्र – सरकारी क्षेत्र एवं निजी क्षेत्र वेतनभोगी – जहाँ वेतन तय है वहीँ इसका उपयोग सही है ।

2. व्यय विधि – Expenditure Method

किसी अर्थव्यवस्था में आय – व्यय बिन्दुओं में होने वाले उपभोग व्यय का योग को ही राष्ट्रीय आय कहते है । भारत में लेनदेन बिना बिल के ही ज्यादातर किये जाते है जिससे यह विधि का प्रयोग भारत में एक समस्या है ।

3. उत्पादन विधि – Value Added Method

अंतिम उत्पादित वस्तु या सेवा का मौद्रिक मूल्य ही मूल राष्ट्रीय आय है ।  इसे वस्तु या सेवा विधि भी कहा जाता है ।प्राथमिक ( Primary ) एवं द्वितीयक ( Secondory ) क्षेत्र के उत्पादन में यही विधि ज्यादा उपयोगी होती है तथा तृतीयक क्षेत्र के लिए आय-व्यय विधि का उपयोग होता है ।
उत्पादन विधि में राष्ट्रीय आय को दर्शाने के लिए 04 विधि है : 
GDP – Gross Domestic Product ( सकल घरेलु उत्पाद )
GNP – Gross National Product ( सकल राष्ट्रीय उत्पाद )
NDP – Net Domestic Product ( शुद्ध घरेलु उत्पाद )
NNP – Net National Product ( शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद )
(A) GDP – Gross Domestic Product ( सकल घरेलु उत्पाद )किसी अर्थव्यवस्था में किसी वित्तीय वर्ष में उसकी घरेलु सीमा में अंतिम उत्पादित वस्तु या सेवा का मौद्रिक मूल्य है ।
(B) GNP – Gross National Product ( सकल राष्ट्रीय उत्पाद ) – राष्ट्रिय आय की गणना में NFIFA ( Net Factor Income For Abrode – विदेशों से प्राप्त शुद्ध कारक आय ) की गणना जरुरी है । 
NFIFA – 1. भारतियों द्वारा विदेशों से अर्जित आय – भारत में आएगा  2. विदेशियों द्वारा भारत में अर्जित आय – भारत से बाहर जायेगा । ये सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों हो सकता है । 
GNP = GDP + NFIFA ( + – )
  • जब GDP में विदेशों से प्राप्त शुद्ध कारक को जोड़ दिया जाता है तो GNP बनता है ।
  • NFIFA खुली अर्थव्यवस्था से जुडा हुआ है ।
  • बंद अर्थव्यवस्था में यह शून्य होता है ।
  • यदि NFIFA सकारात्मक (Positive ) है तो GNP GDP से बड़ा होगा ।
  • यदि NFIFA नकारात्मक ( Negative ) है तो GNP GDP से छोटा होगा ।
(C) NDP – Net Domestic Product ( शुद्ध घरेलु उत्पाद ) – राष्ट्रीय आय को जांचने के लिए सकल के बजे शुद्ध मूल्य पर जाना चाहिए । Net= Gross – Depriciation
जब सकल में घिसावट व्यय को घटा दिया जाता है तो NDP बनता है । काम करने के दौरान होने वाला खर्चा घिसावट कहलाता है । NDP = GDP-Depriciation
(D) NNP – Net National Product ( शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद ) – राष्ट्रीय आय को दर्शाने वाला मूल विचार GDP है लेकिन GDP में 2 कमियां है –
(i) इसमें विदेशों से प्राप्त आय शामिल नहीं है 
(ii) NFIFA में घिसावट व्यय शामिल नहीं है 
जब पहली कमी को दूर किया जाता है तो GNP बन जाता है और दूसरी कमी को दूर किया जाता है तो NDP बना जाता है ।
जब दोनों कमियों को दूर किया जाता है तो NNP बन जाएगा इसे करने के दो तरीकें है – 
(i) – GDP – Depriciations = NDP
(ii) – NDP+NFIFA = NNP
NNP राष्ट्रीय आय की गणना का व्यापक पैमाना है , और भारत सहित दुनियां के सभी देश राष्ट्रीय आय की गणना NNP में ही करते है ।

राष्ट्रीय आय की गणना में विभिन्न मूल्यों का प्रयोग – Use of different Values in National Income Calculation

1. कारक मूल्य – Factor Cost 
2. बाजार मूल्य – Market Cost
Factor Cost कारक मूल्य वह है जो Factor of Production को प्राप्त हुआ था 
Factory में लगी लागत Factor Cost कहलाता है 
Market Cost = Factor Cost + Indirect Tax (GST)
भारत में राष्ट्रीय आय दिखाने का तरीका NNP (MC )जानी चाहिए क्योंकि यही वास्तविक उत्पादन में वृद्धि है, इसलिए NNP Factor Cost को जनवरी 2015 तक भारत में प्रयोग किया जाता था ।
जनवरी 2015 से हम NNP Market Cost को उपयोग कर रहे है ।

राष्ट्रीय आय की गणना में वर्तमान वर्ष एवं आधार वर्षों  का प्रयोग – Effect of Current Year and Base Years in National Income Calculation

आधार वर्ष – Base Year – Real National Income

  • जहाँ कारक मूल्य या बाजार मूल्य पर महंगाई का प्रभाव स्थिर हो चूका है ।
  • आधार वर्ष वो है जिस वर्ष के मूल्य पर राष्ट्रीय आय की गणना की जाति है, ताकि महंगाई का प्रभाव हटाया जा सके और कीमतों की अस्थिरता से बचा जा सके ।
  • आधार वर्ष पर गणना को वास्तविक आय कहते है ।
  • जैसे जैसे महंगाई का प्रभाव स्थिर होता जाता है हम आधार वर्ष को आगे ले जातें है ।
भारत में राष्ट्रीय आय की गणना का तरीका एनएनपी, लेकिन व्यापक अवधारणा NNPMC/Base Year