Sharabhpuriya Vansh ( Amrarya ) in Chhattisgarh

Sharabhpuriya Vansh ( Amrarya ) in Chhattisgarh : इसके पहले भाग में हमने Parwat Dwarak and Soma Vansh of Utkal (Odisha) Chhattisgarh History के बारे में पढ़ा । जिसमें पर्वत द्वारक वंश एवं सोम वंश ( उत्कल-ओडिशा )  की जानकारी प्राप्त की, इसी को आगे बढ़ाते हुए हम आज यहाँ छत्तीसगढ़ के अन्य क्षेत्रीय राजवंश के बारे में पढेंगे ।

Sharabhpuriya Vansh ( Amrarya ) in Chhattisgarh 

Sharabhpuriya Vansh ( Amrarya ) in Chhattisgarh

शरभपुरीय वंश – अमरार्या ( Sharabhpuriya Vansh – Amrarya ) – 5 वी – 7 वी शताब्दी 

  • क्षेत्र – संबलपुर , रायपुर एवं रायगढ़ 
  • संस्थापक – महाराज शरभराज 
  • इतिहास – महाराज शरभराज  जो की इस वंश के संस्थापक थे ये राजा प्रवरसेन के यहाँ सामंत थे इस वंश को अमरार्यकुल के नाम से भी जाना जाता है, तथा शरभपुर को आर्य सभ्यता का द्वीप कहते है। 
  • स्रोत – इस वंश की जानकारी भानुगुप्त के ऐरण अभिलेख (510ई.) तथा सुखदेव राज के सिरपुर ( कौवाताल अभिलेख ) से प्राप्त होती है

प्रमुख शासक 

1.  शरभराज : इस वंश के संस्थापक राजा शरभराज थे  इन्होने  \”वाकाटकों\” के आपसी संघर्ष का लाभ उठाकर स्वयं को स्वतंत्र घोषित किया तथा प्राकृत भाषा के स्थान पर संस्कृत भाषा को राज्य शासन का भाषा बनाया 

2. राजा नरेन्द्र  : राजा नरेन्द्र ने वैष्णव धर्म को अपनाया तथा परम भागवत की उपाधि धारण की । इसके संदर्भ में जानकारी पिपरदुला ताम्र पत्र अभिलेख ( सारंगढ़ ) से प्राप्त होती है 

इसके अतिरिक्त करुन्द अभिलेख (धमतरी) जिसमें इनके सैन्य अभियानों का वर्णन है, जो इनके शासन काल के 24 वें वर्ष में जारी किया गया। राजा नरेन्द्र के मुद्रा में पांच कलश से लक्ष्मी स्नान का चित्रण है 

3. प्रसन्नमात्र  – प्रसन्नमात्र ने प्रसन्नपुर नामक शहर ( मल्हार – बिलासपुर ) की स्थापना की, यह लीलागर नदी के तट पर स्थित है । इन्होने मल्हार में सिक्के बनाने का टकसाल बनवाया तथा बड़े पैमाने में स्वर्ण सिक्के का प्रचलन करवाया 

प्रसन्नमात्र इस वंश के सबसे शक्तिशाली शासक माने जाते है। इनका साम्राज्य कटक (उड़ीसा ) से लेकर चांदा (महाराष्ट्र) तक विस्तृत था । इनके सिक्को में गरुढ़ एवं शंख चित्र अंकित है इनके कुल 116 सिक्कें प्राप्त हुए है । प्रसन्नमात्र के दो पुत्र जयराज एवं दूर्गराज थे 

4. जयराज – इन्होने भी वैष्णव धर्म को अपनाया तथा परम भागवत की उपाधि धारण की । इसकी जानकारी मल्हार ताम्रपत्र अभिलेख से होती है । इसके साथ ही इस अभिलेख से ज्ञात होता है की इन्होने मुंगेली को तहसील बनवाया तथा ब्राह्मणों को भूमि दान देने की प्रथा प्रारंभ की 

मुंगेली के ही विष्णु स्वामी नामक ब्राह्मण को भूमि दान में दिया । आरंग ताम्रपत्र अभिलेख से इनके प्रत्यक्ष शासन व्यवस्था शरभपुर  तथा पूर्वी राष्ट्र संबलपुर को माना गया है 

5. दुर्गराज ( मनमात्र ) – इन्होने ( लोचन प्रसाद पांडे के अनुसार ) दूर्ग शहर की स्थपना की किन्तु अन्य साहित्यकार सहमत नहीं है 

6. सुखदेवराज (सुदेवराज) –  यह दुर्गराज का पुत्र था , इसने आरंग तक शासन किया एवं सिरपुर की स्थापना की । इनकी जानकारी 8 ताम्रपत्रों से प्राप्त होती है, जिसमें 6 ताम्रपत्र अभिलेख शरभपुर से प्राप्त हुए है । जिसमें शरभपुर लिखा हुआ है और 2 ताम्रपत्र सिरपुर से प्राप्त हुए जिसमें सिरपुर लिखा हुआ है । 

सुदेवराज की बहन \”लोकप्रकाशा\” का विवाह पांडू वंश के शासक इंद्रबल के साथ हुआ । सुदेवराज ने इन्द्रबल को सर्वाधिकार कर्ता की उपाधि दी, इसके सम्बन्ध में जानकारी कौवाताल अभिलेख सिरपुर से प्राप्त होती है 

7. प्रर्वरराज I –  इन्होने सिरपुर को द्वितीय राजधानी बनाया था

8. प्रर्वरराज II ( महाप्रर्वरराज ) –  ये सुदेवराज के पुत्र थे, इनके शासन काल में इंद्रबल के चाचा सुरबल की सहायता से प्रर्वरराज II पराजित किया। इसके सम्बन्ध में जानकारी इंद्रबल के अलंगा अभिलेख बिलासपुर से प्राप्त होती है । प्रर्वरराज II का ठकुरदिया ताम्रपत्र अभिलेख ( सारंगढ़ ) तथा मल्हार से प्राप्त अभिलेख से इनके शासनकाल की जानकारी प्राप्त होती है।

नोट : 
  • इस वंश के सोने के सिक्के जारी करने वाले प्रथम शासक शरभराज थे
  • शरभपुरीय ताम्रपत्रों पर जारी करने की तिथि, उसका स्थान एवं वर्ष का उल्लेख मिलता है परन्तु इसमें चित्र की प्राप्ति नहीं होती 
  • इसकी राजमुद्रा – गजलक्ष्मी 
  • इस वंश के शासकों ने \”तालागांव\” बिलासपुर में काल पुरुष रूद्र शिव की प्रतिमा का निर्माण कराया है ( इसे 10 जानवरों की रूप प्रतिरूप से बनाया गया है )
प्रमुख अभिलेख 
  1. प्रयाग प्रस्तति अभिलेख – समुद्रगुप्त 
  2. ऐरण अभिलेख – भानुगुप्त 
  3. पिपरुपुला ताम्रपत्र – राजा नरेन्द्र ( सारंगढ़ )
  4. करुन्द अभिलेख – राजा नरेन्द्र ( धमतरी )
  5. मल्हार ताम्रपत्र अभिलेख – जयराज 
  6. आरंग ताम्रपत्र अभिलेख – जयराज 
  7. शरभपुर ताम्रपत्र अभिलेख 6 – सुदेवराज 
  8. शरभपुर ताम्रपत्र अभिलेख 2 – सुदेवराज 
  9. कौवाताल अभिलेख (सिरपुर ) – सुदेवराज ( सम्पूर्ण शरभपुरीय )
  10. अलंगा अभिलेख ( बिलासपुर ) – इंद्रबल 
  11. ठकुरदिया ताम्रपत्र अभिलेख ( सारंगढ़ ) – प्रर्वरराज II

Chhattisgarh Bastar Chhindak Naagvanshi History

Chhattisgarh Bastar Chhindak Naagvanshi History: पिछले  भाग में हमने Som Vansh of Maikal and Sirpur ( Pandu Vansh ) Baan Vansh  के बारे में पढ़ा । जिसमें छत्तीसगढ़ के राजवंश  की जानकारी प्राप्त की, इसी को आगे बढ़ाते हुए हम आज यहाँ छत्तीसगढ़ के मध्यकालीन इतिहास के बस्तर छिन्द्क नागवंशी के बारे में पढेंगे ।

Chhattisgarh Bastar Chhindak Naagvanshi History

Chhattisgarh Bastar Chhindak Naagvanshi History

बस्तर का छिन्द्क नागवंशी – 1023 ई. – 1324 ई. 

मध्यकाल में बस्तर को चक्रकोट , चक्रकोट्टा एवं भ्रमरकोट के नाम से जाना जाता था । छिन्द्क वंश का शासन क्षेत्र चक्रकोट या भ्रमरकोट मण्डल था  जिसमें चक्रकोट का चिन्ह सर्प एवं शासक व्याघ्र तथा भ्रमरकोट का चिन्ह ऐरावत, कमल, करली  था 

छिन्द्क नागवंशियों का गोत्र कश्यप था, इनकी आरम्भिक राजधानी \”भोगवती पूरी\” थी जो दंतेवाडा के भो ग्राम स्थान को माना जाता है जिसकी जानकारी 28 ताम्रपत्रों एवं शिलालेख से होती है 

इस वंश के शासकों ने संस्कृत एवं तेलुगु भाषा का प्रयोग किया जिसमें संस्कृत  इन्द्रावती के उत्तर भाग एवं तेलुगु भाषा के ताम्रपत्र अभिलेख  इन्द्रावती के दक्षिण भाग से प्राप्त किये गए 

नोट : इस वंश के शासक भोगवती पुरेश्वर की उपाधि धारण किये थे 

छिन्दक नागवंशी के प्रमुख शासक 

1. नृपतिभूषण : नृपतिभूषण इस वंश के संस्थापक राजा है, अन्य लेखो में इनका नाम \”क्षिति-भूषण\” भी प्राप्त होता है । इनका उल्लेख ऐर्राकोटा अभिलेख तथा तेलुगु शिलालेख में मिलता है 

2. धारावर्ष ( जगदेव-भूषण ): धारावर्ष के सामंत चंद्रादित्य ने बारसूर में एक तालाब का उत्खनन कराया एवं बारसूर क्षेत्र में ही चंद्रादित्य मन्दिर या चंद्रादित्तेश्वर ( शिव मन्दिर ) एवं मामा भांजा मन्दिर ( गणेश मन्दिर ) बनवाया, एवं इन्होने दंतेवाडा ( वर्तमान – नारायणपुर ) में विशाल गणेश प्रतिमा का निर्माण कराया 

धारवर्ष की मृत्यु के पश्चात् उनके सम्बन्धी \”मधुरान्त्क देव\” एवं बड़े पुत्र \”सोमेश्वर देव\” के मध्य सत्ता हस्तांतरण की स्थिति उत्पन्न हुई 

3. मधुरान्त्क देव: मधुरान्त्क देव भ्रमरकोट का मांडलिक ( मंडल अधिकारी ) था , कुछ ही समय के लिए इन्होने शासन किया । इनके सम्बन्ध में जानकारी जगदलपुर से प्राप्त  एक अभिलेख से होती है, जिसमें इनके द्वारा भ्रमर कोट मंडल के एक ग्राम \”राजपुर\” को दान में दिए जाने का उल्लेख है

4. सोमेश्वर देव: ये \”धारावर्ष के बड़े पुत्र थे, इन्होने राज्भुष्ण की उपाधि धारण की । सोमेश्वर देव ने चालुक्य शासकों से गठबंधन किया तथा मधुरान्त्क ने चोल शासकों से गठबंधन किया एवं इनके मध्य युद्ध हुआ । 

इस युद्ध में सोमेश्वर देव ने मधुरान्तक को पराजित कर \”भोगवती पुरेश्वर\” की उपाधि धारण की । सोमेश्वर देव की जानकारी कुरुसपाल अभिलेख तथा समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति अभिलेख से प्राप्त होती है 

कल्चुरी वंश के रतनपुर शासक \”पृथ्वीदेव I\” को तथा सिरपुर के नलवंशी शासक एवं पान्डु वंश के शासक को पराजित कर 6 लाख 96 हजार ग्रामों को अपने अधिकार में लिया।
इसके अतिरिक्त इन्होने उत्कल के सोमवंशीय अंतिम  शासक उद्योग केसरी को पराजित किया। सोमेश्वर देव पर कलचुरी वंश के शासक \” जाजल्यदेव I\” ने आक्रमण किया तथ इनके सेना मंत्री एवं रानी को बंदी बना लिया परन्तु सोमेश्वर देव की माता \”गुंडमहादेवी\” के आग्रह करने पर उन्हें छोड़ दिया गया।
इसके सम्बन्ध में जानकारी गुंडम महादेवी के शिलालेख से प्राप्त होती है। सोमेश्वर देव के बाद \”कन्हार देव\” ने शासन किया, इसका उल्लेख कुरुसपाल अभिलेख एवं राजपुर अभिलेख से प्राप्त होती है ।
5. हरिश्चंद्र देव: हरिश्चंद्र देव इस वंश के अंतिम शासक थे, इसकी जानकारी तेमरा/टेमरा अभिलेख से प्राप्त होती है जिसमें सती प्रथा का उल्लेख या प्रमाण मिलता है 
हरिश्चंद्र देव को काकतीय वंश के शासक \” अन्नमदेव\” ने पराजित किया एवं पुरे शासन को अपने अधिकार में ले लिया। हरिश्चंद्रदेव की पुत्री \”चमेली देवी\” का युद्ध अन्नमदेव से हुआ ।
नोट: चमेली देवी के सन्दर्भ में उनकी वीरता के कारण बस्तर क्षेत्र में गाथा गायन किया जाता है ।

छिन्द्क नागवंशी के  प्रमुख अभिलेख 

  1. ऐर्राकोटा अभिलेख  – नृपतिभूषण 
  2. जगदलपुर अभिलेख – मधुरान्त्क देव का उल्लेख 
  3. कुरुसपाल अभिलेख – सोमेश्वर देव का उल्लेख 
  4. तेमरा/टेमरा अभिलेख – हरिश्चंद्र देव का उल्लेख 
  5. राजपुर अभिलेख – कन्हार देव का उल्लेख 

Som Vansh of Maikal and Sirpur ( Pandu Vansh ) Baan Vansh

Som Vansh of Maikal and Sirpur ( Pandu Vansh ) Baan Vansh : पिछले  भाग में हमने छत्तीसगढ़ के शरभपुरीय (अमरार्य ) वंश  के बारे में पढ़ा । जिसमें शरभपुरीय  वंश  की जानकारी प्राप्त की, इसी को आगे बढ़ाते हुए हम आज यहाँ छत्तीसगढ़ के अन्य क्षेत्रीय राजवंश के बारे में पढेंगे ।

Som Vansh of Maikal and Sirpur ( Pandu Vansh ) Baan Vansh

Som Vansh of Maikal and Sirpur ( Pandu Vansh ) Baan Vansh

छत्तीसगढ़ के  सोम वंश (  Som Vansh )

मैकाल के सोम वंश – ( Maikal Som Vansh )

मैकाल के सोम वंश पान्डु वंश की एक शाखा थी, इनकी राजधानी अमरकंटक थी । इस वंश के प्रमुख शासकों में वत्सबल ( उददयन ), नागबल, सुरबल, भरतबल एवं जयबल ।  सूरबल के बारे में जानकारी मल्हार ताम्रपत्र अभिलेख से प्राप्त हुई है । 

सोम वंश (पान्डू वंश ) – ( Pandu Vansh ) 6 वीं – 8 वीं शताब्दी 

राजधानी –  सिरपुर 
दक्षिण कोसल के बड़े क्षेत्र में पान्डु वंश ने अपनी सत्ता स्थापित की इन्होने सिरपुर को केंद्र मानकर शासन किया। ये स्वयं को सोमवंशी पांडव भी कहते है । इस वंश के आदि पुरुष का उल्लेख वत्सबल ( उददयन ) के नाम से है । 
इसका उल्लेख कालिंजर अभिलेख (उ.प्र.) से प्राप्त होता है ।  इसके साथ ही भवदेव रणकेसरी के भंदक शिलालेख से प्राप्त होती है ।  
पान्डु वंश का प्रथम शासक तथा दक्षिण कोसल में पान्डु वंश का संस्थापक \”इंद्रबल\” को माना जाता है, जिन्होंने छत्तीसगढ़ से शरभपुरीय वंश को समाप्त कर पान्डु वंश की नीवं रखी ।  
छत्तीसगढ़ में इस वंश की दो शाखायें थी 
1) मैकाल श्रेणी अमरकंटक में स्थित \”सोम वंश\” हो इनकी मुल शाखा थी । 
2) सिरपुर सोम वंश ( पान्डु वंश ) का दक्षिण कोसल में शासन । 
इंद्रबल का नाम अन्य अभिलेखों में \”भरतबल\” भी प्राप्त होता है ।  इंद्रबल के दो पुत्र थे – इसानदेव एवं भवदेव रणकेसरी । 
इसानदेव: इसानदेव को इंद्रबल ने खरौद का \”मंडलाधिपति\” बनाया, इसानदेव ने खरौद में लक्ष्मनेश्वर मन्दिर बनाया जो मूलतः शिव मन्दिर है । 
भवदेव रणकेसरी: इंद्रबल ने भवदेव को भाण्डेर ( आरंग ) का \”मंडलाधिपति\” बनाया,  इसके सम्बन्ध में जानकारी भवदेव के भंदक शिलालेख से होती है । 
इंद्रबल ने अपने भाई \”ननराज \” को सिरपुर का शासन क्षेत्र  सौंपा था ।

प्रमुख शासक 

1. इंद्रबल या भरत बल: इंद्रबल शरभपुरीय शासक सुदेवराज के यहाँ सामंत के रूप में कार्य करते थे एवं सुदेवराज के पुत्र प्रर्वरराज IIवर्र्ज की हत्या कर पान्डु वंश की नीवं रखी । इन्होने खरौद नगर को बसाया था और इन्होने अंतिम समय अपने साम्राज्य का विभाजन किया । 
2. ननराज I: इंद्रबल के बाद सिरपुर का शासक बना। 
3. महाशिव तीवरदेव : ये ननराज I के पुत्र थे एवं इस वंश के प्रतापी शासक थे । इनके ताम्रपत्रों में इनका उल्लेख   महाशिव तीवरदेव नाम से होता है एवं इनकी मुद्राओं में तीवरदेव अंकित है ।
महाशिव तीवरदेव की उपाधियों में — महाशिव, परमवैष्णव, पंचमहाशप्त कल्ह्ग की राजतरंगी में प्राप्त होता है । इसके अतिरिक्त राजाधिराज, अधिराज एवं उत्कल कोसल को जीतकर सकल कोसलाधिपति कहलायें । 
इनकी मुद्रा में गरुड़ का अंकन है, इस शासक की जानकारी राजिम, बालोद एवं रायगढ़ ताम्रपत्र अभिलेख से प्राप्त होती है, ये वैष्णव धर्म के अनुयायी थे ।
4. ननराज II : ननराज II महाशिव तीवरदेव का पुत्र था , इसका एक ताम्रपत्र ( अठ्मार ) सक्ती ( रायगढ़) से प्राप्त हुआ । इन्होने नागपुर के वर्धा क्षेत्र को जीता तथा उत्कल क्षेत्र को राजा माधव वर्मन से पराजित हो गए । इन्होने कोसलमंडलाधिपति एवं महाननराज की उपाधि धारण की ।
5. चन्द्रगुप्त  : चन्द्रगुप्त महाशिव तीवरदेव के भाई थे, इन्होने राजा माधव वर्मन को पराजित कर उत्कल को जीता और उसे पुनः बसा कर शासन किया ।
6. हर्षगुप्त  : सिरपुर लेख के अनुसार चन्द्रगुप्त का पुत्र एवं उत्तराधिकारी हुआ । हर्षगुप्त का विवाह \”मौखरी वंश\” की राजकुमारी \”वासटा देवी\” से हुआ , वासटा देवी मौखरी वंश के सूर्यवर्मन की पुत्री थी ।हर्षगुप्त के दो पुत्र थे 1. महाशिवगुप्त बालार्जुन 2. रणकेसरी ।
वासटा देवी ने अपने पति हर्षगुप्त की स्मृति में सिरपुर में लाल इंटों से नागर शैली में लक्ष्मण मन्दिर का निर्माण प्रारंभ करवाया , ये मूलतः विष्णु मन्दिर है । इस मन्दिर को पूर्ण कराने में ईसानदेव ने सहायता की । यह मन्दिर गुप्त कालीन का श्रेष्ठ उदाहरण है ।
हर्षगुप्त ने त्रिकलिंगाधिपति एवं प्राकपरमेश्वर की उपाधि धारण की, इनका उल्लेख नेपाल के शासक जयदेव के शिलालेख में मिलता है ।
7.  महाशिवगुप्त बालार्जुन (595 ई.-655 ई.): महाशिवगुप्त के शासनकाल को \”छत्तीसगढ़ का स्वर्णकाल\” कहा जाता है, इन्होने 60 वर्षों तक शासन किया ।
इसकी जानकारी सिरपुर से प्राप्त 27 ताम्रपत्र अभिलेख से होती है। इन ताम्रपत्रों का अध्ययन सर्वप्रथम \”रमेन्द्र नाथ मिश्र एवं विष्णु सिंह ठाकुर\”  ने किया था । 
महाशिवगुप्त को बाल्यकाल में धनुर्विद्या में निपुण होने के कारण  बालार्जुन कहा गया । इन्हें सहिष्णु भी कहा जाता है । 
इन्होने शैव धर्म को अपनाया और महेश्वर की उपाधि धारण की, बाद में अपने मामा से प्रभावित होकर इन्होने बौद्ध धर्म अपनाया एवं अनेक बौद्ध विहारों का निर्माण कराया, इसके साथ ही इन्होने जैन धर्म के अनुयायी को संरक्षण भी दिया ।
महाशिवगुप्त के शासनकाल में सन 639 ई. में चीनी यात्री \” ह्वेनसांग \” ने छत्तीसगढ़ का भ्रमण किया । 
\” ह्वेनसांग \” ने अपनी सी.यु.की.( यात्रा का वृतांत ) में छत्तीसगढ़ का नाम \”किया स. लो \” से इल्लेखित किया ।महाशिवगुप्त ने कवी इशान को संरक्षण दिया था ।
समकालीन राजा – 1.हर्ष वर्धन 2. पुल्केशियन II 
पुल्केशियन II के दरबारी कवि \”रविकिर्ती\” के ऐहॉल प्रशस्ति अभिलेख में पुल्केशियन II के द्वारा महाशिवगुप्त को पराजित करने का उल्लेख है ।
नोट:
पान्डु वंश के अंतिम शासकों को \”पाली\” के \”बाणवंशी\” शासक विक्रमादित्य ने पराजित किया एवं बिलासपुर क्षेत्र को समाप्त करने का प्रयास किया ।
जबकि पान्डु वंश को पूर्ण रूप से समाप्त करने का श्रेय \”नलवंशी\” शासक विलासतुंग को जाता है ।
महारानी वासटा देवी के द्वारा जो लक्ष्मण मन्दिर का निर्माण कार्य प्रारंभ किया गया था उसे महाशिवगुप्त के द्वारा पूर्ण कराया गया था ।

प्रमुखअभिलेख 

कालिंजर अभिलेख – वत्सबल ( उददयन ) एवं राजधानी सिरपुर का उल्लेख 
भंदक शिलालेख अभिलेख – भवदेव एवं रणकेसरी का उल्लेख 
राजिम, बालोद एवं पौडा ( रायगढ़ ) ताम्रपत्र अभिलेख –  महाशिव तीवरदेव का उल्लेख 
अठ्मार ताम्रपत्र अभिलेख (सक्ति ) – ननराज II का उल्लेख 
सिरपुर अभिलेख – हर्षगुप्त का उल्लेख 
ऐहॉल प्रशस्ति अभिलेख , 27 ताम्रपत्र अभिलेख – महाशिवगुप्त बालार्जुन का उल्लेख 

बाण वंश – ( Baan Vansh )- 9 वीं शताब्दी 

संस्थापक – महामंडलेश्वर मलदेव 
राजधानी – पाली 

प्रमुख शासक 

विक्रमादित्य – इन्होने पान्डु वंशीय अंतिम शासक को पराजित किया और पाली के शिव मन्दिर का निर्माण कराया ( पाली के शिव मन्दिर का जीर्णोंधार कलचुरी शासक \”जाजल्यदेव I ने किया था ) ।
नोट : विक्रमादित्य को कल्चुरी के त्रिपुरी शाखा के शासक शंकरगढ़ ने पराजित किया एवं इस वंश को समाप्त कर दिया ।

Kaaktiya Chalukya Vansh Adhinasth Shasan Chhattisgarh

Kaaktiya Chalukya Vansh Adhinasth Shasan Chhattisgarh – पिछले भाग में हमने Swatantra Kaaktiya Chalukya Vansh Chhattisgarh के बारे में पढ़ा । जिसमें छत्तीसगढ़ बस्तर में  स्वतन्त्र रूप से शासन करने वाले काकतीय चालुक्य राजवंश की जानकारी प्राप्त की, इसी को आगे बढ़ाते हुए हम आज यहाँ छत्तीसगढ़ के मध्यकालीन इतिहास के काकतीय चालुक्य राजवंश एवं उसके अधीनस्थ स्वरुप शासन काल  के बारे में पढेंगे ।

Kaaktiya Chalukya Vansh Adhinasth Shasan Chhattisgarh

Kaaktiya Chalukya Vansh Adhinasth Shasan Chhattisgarh
काकतीय /चालुक्य राजवंश के कुछ शासकों ने स्वतन्त्र रूप से शासन किया था जिसके बारे में हम पढ़ चुके है तथा कुछ शासकों ने किसी न किसी बड़े शासक के अधीन रहकर शासन किया था जिसके बारे में हम इस भाग में पढेंगे ।

मराठों के अधीन शासन 

1. दरिया देव ( 1778-1800 ई. )

अजमेर सिंह के विरुद्ध अंग्रेज एवं मराठा शासक अवीर देव एवं जैपोर के शासक विक्रम देव से सहायता लिया एवं अजमेर सिंह से युद्ध कर अजमेर सिंह को पराजित किया ।
दरिया देव मराठो के अधीन प्रथम काकतीय शासक है ।

कोटपाड़ की संधि (1778 ई. ) – काकतीय वंश एवं मराठो के अधीन संधि हुई जिसमें काकतीय वंश मराठों के अधीन एक जमींदारी क्षेत्र बनकर शासन किया करते थे और जो मराठो को 5600 रु टकोली ( कर ) के रूप में दिया करते थे ।
दरिया देव के शासन काल में 1795 ई. में अंग्रेज अधिकारी कैप्टन ब्लंट का छत्तीसगढ़ आगमन हुआ जो कांकेर क्षेत्र तक ही प्रवेश कर सके एवं बस्तर के जनजातियों के विरोध करने पर उन्हें वापस लौटना पड़ा ।

आंग्ल  मराठों के अधीन शासन

1. महिपाल  देव ( 1800-1842 ई. )

महिपाल देव दरिया देव का पुत्र था, इन्होने मराठों की अधीनता स्वीकार नहीं किया और मराठों को टकोली देना बंद कर दिया परिणामस्वरूप व्यौजी भोसलें अपने सेनापति रामचन्द्र बाघ को महिपाल देव के पास भेजा एवं रामचन्द्र बाघ ने महिपाल देव को पराजित किया ।
रामचन्द्र ने पुनः काकतीय वंश को मराठों के अधीन किया और इसके साथ ही सिहावा परगना को 1830 ई.में  मराठा साम्राज्य में सम्मिलित किया ।
इसके शासन काल में तारापुर परगने का प्रमुख परलकोट का विद्रोह ( 1824-1825 ई. ) किया गया । महिपाल देव के 2 पुत्र थे – भूपाल देव एवं दलमंजन सिंह ।

2. भूपाल  देव ( 1842-1853 ई. )

ये महिपाल देव के पुत्र थे। मराठा शासकों के द्वारा दंतेश्वरी मंदिर में नरबली प्रथा रोकने में असफल होने के कारण इन पर अभियोग लगाया गया ।
इनके शासन काल में 2 विद्रोह हुए : 1. तारापुर विद्रोह  2. मेंरिया विद्रोह  

अंग्रेजों के अधीन शासन 

लार्ड डलहौजी के हड़पनिति के तहत नागपुर राज्य का ब्रिटिश साम्राज्य 1855 में विलय किया गया, इस व्यवस्था से सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ का क्षेत्र प्रत्यक्ष रूप से ब्रिटिश शासन के नियंत्रण में चला गया 
इस परिवर्तन के कारण सम्पूर्ण बस्तर क्षेत्र  प्रशासनिक एवं राजनितिक रूप से ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन हो गया 

1. भैरम देव ( 1853-1891 ई. )

अंग्रेजों के अधीन प्रथम काकतीय शासक थे, इनके शासनकाल में 1855-56 में प्रथम डीप्टी कमिश्नर चार्ल्स इलियट का आगमन हुआ ।
भैरमदेव के द्वारा बस्तर क्षेत्र में प्राथमिक शिक्षा हेतु स्कुल की स्थापना की गई ।
इनके शासनकाल में 3 आदिवासी विद्रोह हुए : 
1. लिंगागिरी विद्रोह (1856-57)
2. कोई विद्रोह (1859)
3. मुड़िया विद्रोह (1876)
नोट: रानी चोरिस देवी का विद्रोह (1878-1886) – रानी चोरिस भैरम देव की पत्नी थी एवं छत्तीसगढ़ की प्रथम विद्रोहिणी थी । इनका मूल नाम जुगराज कुवर था । इन्होने अपने पति के खिलाफ विद्रोह किया था 

2. रूद्र प्रताप देव ( 1891-1921 ई. )

रूद्र प्रताप को ब्रिटिश शासन के द्वारा \” सेंट-ऑफ़-जेरुसलम\” की उपाधि दी गई थी, इन्होने जगदलपुर में नगर नियोजन कर जगदलपुर को चौराहों का नगर बनाया ।
इनके शासन काल में \”घैटीपोनी\” प्रथा प्रारम्भ किया गया, इस प्रथा में कलर, धोबी, पंडरा, सुंडी जाति की महिलाओं को विक्रय किया जाता था ।
रूद्र प्रताप देव के शासनकाल में 1910 में नेतानार के जमींदार गुंडाधुर के नेतृत्त्व में भूमकाल विद्रोह हुआ ।

3. प्रफुल्ल कुमारी देवी  ( 1922-1936 ई. )

ये छत्तीसगढ़ की प्रथम महिला शासिका थी । 1936 में इनकी मृत्यु अपेंडिक्स रोग का इलाज किया जाने के कारण लंदन में हुआ ।

4. प्रवीर चन्द्र भंजदेव  ( 1936-1947 ई. )

ये इस वंश के अंतिम शासक थे । इसके शासनकाल में बस्तर रियासत को जनवरी 1948 में भारतीय संघ में सम्मिलित कर लिया गया ।
नोट: छत्तीसगढ़ शासन द्वारा इनकी स्मृति में \”तीरंदाजी\” के क्षेत्र में प्रवीर चन्द्र भंजदेव पुरस्कार प्रदान किया जाता है ।